कोज़िकोड, केरल: हाल ही में कोज़िकोड के समुद्र तट पर एक दुर्लभ भारतीय महासागरीय हंपबैक डॉल्फिन की मौत की नेक्रोप्सी (शव परीक्षण) से पता चला है कि उसकी मौत का कारण उसकी आंतों में फंसा प्लास्टिक मछली पकड़ने का जाल था। यह घटना समुद्री प्रदूषण और विशेषकर ‘घोस्ट नेट्स’ के खतरों को उजागर करती है, जो समुद्री जीव-जंतुओं के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।
केरल के कोज़िकोड तट पर पाई गई इस डॉल्फिन की मौत ने स्थानीय और राष्ट्रीय समुद्री संरक्षण एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। इंडियन ओशन हंपबैक डॉल्फिन, जो कि पहले से ही विलुप्तप्राय है, समुद्री जाल और प्लास्टिक कचरे के कारण गंभीर खतरे में है। यह डॉल्फिन अपने शरीर के आकार की वजह से अक्सर मछली पकड़ने के जाल में उलझ जाती है, जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है।
भारतीय महासागर मछली अनुसंधान संस्थान (CMFRI) द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, समुद्री स्तनधारियों की संख्या लगातार कम हो रही है और किनारे पर मरे हुए जीवों की संख्या अत्यधिक बनी हुई है। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि समुंद्री डॉल्फिन इस प्रदूषण के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं।
समुद्री प्रदूषण में बढ़ोतरी के कारण ‘घोस्ट नेट्स’ की समस्या एक गंभीर बनती जा रही है। ये जाल, जो मछली पकड़ने के बाद समुद्र में छोड़े जाते हैं या खो जाते हैं, वर्षों तक समुद्र में रहते हैं और जीवों को फंसाकर उनकी मौत का कारण बनते हैं। यह न केवल समुद्री जीवों के लिए संकट है बल्कि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और पर्यावरण संरक्षण संगठन मिलकर समुद्री प्रदूषण को कम करने के लिए कड़े नियम लागू करें और प्लास्टिक व मछली पकड़ने के जाल के उचित प्रबंधन पर ध्यान दें। इसके अलावा स्थानीय मछुआरों को जागरूक कर घोस्ट नेट्स की समस्या को समझाना भी अत्यंत आवश्यक है।
डॉल्फिन की यह दुर्भाग्यपूर्ण मौत भारत के समुद्री पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति का एक स्पष्ट उदाहरण है, जो जल्द ही रोकथाम और सुधारात्मक कदमों की मांग करता है। हमें तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करनी होगी ताकि समुद्र की यह अनमोल धरोहर बचाई जा सके।

