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गोरखपुर, उत्तर प्रदेश: गोरखपुर के जिला अस्पताल से अपहृत 10 वर्षीय बालिका के दुष्कर्म और हत्या मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने जांच को नया मोड़ दे दिया है। अब तक पुलिस गला दबाकर हत्या की आशंका जता रही थी, लेकिन चिकित्सकीय जांच में सामने आया है कि आरोपित ने बालिका के शरीर पर धारदार हथियार से कई वार किए थे। रिपोर्ट के अनुसार जंघा, पेट और जबड़े पर गंभीर घाव मिले हैं, जिनसे अंदरूनी अंग भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए। पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सकों ने अपनी रिपोर्ट में इन चोटों का विस्तृत उल्लेख किया है। रिपोर्ट के आधार पर पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि ये सभी चोटें बालिका के जीवित रहते पहुंचाई गई थीं या मृत्यु के बाद। इस संबंध में चिकित्सकों और फोरेंसिक विशेषज्ञों की राय भी ली जा रही है, ताकि विवेचना को और मजबूत बनाया जा सके। जांच अधिकारियों का मानना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आए नए तथ्यों से अभियोजन पक्ष को महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलेंगे। पुलिस अब हत्या में इस्तेमाल किए गए धारदार हथियार की बरामदगी को प्राथमिकता दे रही है। इसके लिए आरोपित को पुलिस कस्टडी रिमांड पर लेकर पूछताछ की तैयारी की जा रही है। एसपी सिटी निमिष पाटिल ने बताया कि पुलिस चिकित्सकीय साक्ष्य, फोरेंसिक रिपोर्ट और डीएनए जांच समेत सभी वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर मामले की जांच आगे बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि हत्या में प्रयुक्त हथियार की बरामदगी से केस और मजबूत होगा तथा अदालत में प्रभावी ढंग से साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकेंगे। पुलिस का कहना है कि मामले की हर पहलू से जांच की जा रही है और दोषी को कानून के तहत कड़ी सजा दिलाने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे।
Ozempic, Mounjaro and weight loss: What GLP-1 drugs mean for body positivity

देश में ओज़ेमपिक, माउंटजारो और वेगोवी जैसी दवाओं की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। ये दवाएं मोटापा एक क्रॉनिक चिकित्सीय स्थिति के रूप में पुनर्परिभाषित कर रही हैं, जिससे न केवल चिकित्सा जगत में बल्कि समाज में भी मोटापे को लेकर विचारधाराएं बदल रही हैं।

ओज़ेमपिक और माउंटजारो जैसी GLP-1 (ग्लूकागन-लाइक पेप्टाइड-1) दवाएं, जिनका उपयोग डायबिटीज और वजन घटाने दोनों के लिए किया जाता है, भारत में आने के बाद से ही चर्चा का विषय बनी हैं। इन दवाओं का काम भूख को नियंत्रित करना और शरीर की कैलोरी खपत को प्रभावित करना है, जिससे व्यक्ति का वजन कम होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मोटापा अब केवल एक जीवनशैली समस्या नहीं रह गया बल्कि इसे एक चिकित्सीय बीमारी के रूप में भी माना जाना चाहिए।

इस बदलाव ने मोटापे के प्रति सामाजिक रवैया और शरीर की सकारात्मकता आंदोलन (body positivity movement) में बहस को तेज कर दिया है। शरीर की सकारात्मकता आंदोलन यह मानता है कि हर शरीर सुंदर और स्वीकार्य है, चाहे वजन कोई भी हो। लेकिन अब जब नई दवाएं वजन घटाने को आसान बना रही हैं, तो चुस्त-दुरुस्त शरीर रखने की मांग भी बढ़ रही है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह आंदोलन पुनः पतलेपन के पक्ष में झुक जाएगा या फिर लोगों को हर आकार में शरीर को अपनाने की स्वतंत्रता मिलेगी।

इसके साथ ही दवाओं के दुरुपयोग की चिंताएं भी प्रबल हो रही हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बिना चिकित्सकीय सलाह के इन दवाओं का इस्तेमाल स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। इसके अलावा, इन दवाओं की उच्च कीमत और देश के ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में सीमित पहुंच भी एक बड़ी समस्या है। इससे सिर्फ अमीर वर्ग ही नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से इन दवाओं का उपयोग कर पाता है, जिससे स्वास्थ्य असमानता भी बढ़ सकती है।

डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मोटापे का इलाज केवल दवाओं से नहीं हो सकता। इसका प्रभावी प्रबंधन आहार, व्यायाम और मानसिक स्वास्थ्य सुधार के साथ ही होना चाहिए। मोटापा एक जटिल समस्या है, जिस पर समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

निष्कर्षतः, ओज़ेमपिक, माउंटजारो और वेगोवी जैसी दवाएं मोटापे की चिकित्सा को नई दिशा दे रही हैं, लेकिन इसके साथ ही सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्तर पर कई नए प्रश्न भी सामने आ रहे हैं। यह देखना अब रुचिकर होगा कि भारत में स्वास्थ्य नीतियां और सामाजिक अभियान इन बदलावों के साथ कैसे तालमेल बिठाते हैं।

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