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Critically endangered Peacock Tarantula in spotlight after Pawan Kalyan post

आंध्र प्रदेश के नगरजुनसागर श्रीसैलम टाइगर रिजर्व में संकटग्रस्त मोर मकड़ी (Peacock Tarantula) के संरक्षण के उद्देश्य से वैज्ञानिक सर्वेक्षण प्रारंभ कर दिया गया है। यह सर्वेक्षण इस दुर्लभ और संवेदनशील प्रजाति की आबादी तथा उसके प्राकृतिक आवास का मानचित्रण करने के लिए किया जा रहा है।

नगरजुनसागर श्रीसैलम टाइगर रिजर्व में चल रहे इस सर्वेक्षण को स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के वन्यजीव वैज्ञानिकों द्वारा संचालित किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मोर मकड़ी की संख्या लगातार घट रही है, जिससे यह प्रजाति संकटग्रस्त हो चुकी है। इसके संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाना समय की मांग है।

सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य इस मकड़ी की प्राकृतिक आवास की पहचान, उसकी आबादी का आकलन और संरक्षण के लिए जरूरी नीतियाँ बनाना है। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इस सर्वेक्षण से मिले आंकड़ों के आधार पर दीर्घकालिक योजनाएं बनाई जाएंगी, जिससे इस महत्वपूर्ण प्रजाति का अस्तित्व सुरक्षित रखा जा सके।

विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि मिद आठ, इस मकड़ी का निवास जंगल के गहरे इलाकों में होता है, जहां मानव गतिविधि कम होती है। बावजूद इसके, पर्यावरणीय बदलाव और अवैध शिकार के कारण यह प्रजाति खतरे में है। इसीलिए इस तरह के वैज्ञानिक प्रयास आवश्यक हो गए हैं।

इसके अलावा, हाल ही में अभिनेता और समाजसेवी पवन कल्याण ने इस प्रजाति के संरक्षण पर जोर देते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था, जिसके बाद जनसामान्य में इस मकड़ी को लेकर जागरूकता बढ़ी है। उनके इस प्रयास ने वन विभाग और वैज्ञानिकों को भी प्रोत्साहित किया है कि वे इस दिशा में और काम करें।

नगरजुनसागर श्रीसैलम टाइगर रिजर्व के व्यवस्थापक ने कहा, “हम सभी का कर्तव्य है कि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील रहें। इस संकटग्रस्त प्रजाति के लिए यह सर्वेक्षण एक महत्वपूर्ण कदम है। हमें उम्मीद है कि इससे न केवल संरक्षण के उपाय बेहतर होंगे, बल्कि स्थानीय लोगों में भी जागरूकता आएगी।”

इस सर्वेक्षण में राज्य और केंद्र सरकार के वन विभागों, जीवविज्ञान संस्थानों और गैर-सरकारी संगठनों के विशेषज्ञ शामिल हैं। सर्वेक्षण पूरा होने के बाद विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसे सार्वजनिक किया जाएगा और नीति निर्माताओं के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

इस प्रकार के संरक्षण प्रयासों से न केवल संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा होगी, बल्कि जैवविविधता के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।

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