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नई दिल्ली: नागरिक समाज संगठनों ने राष्ट्रीय अनिवार्य दवाओं की सूची (NLEM) को संशोधित करने के लिए एक पारदर्शी, समयबद्ध और हितों के टकराव से मुक्त प्रक्रिया की पुकार लगाई है। उन्होंने जोर देकर कहा है कि यह प्रक्रिया नवीनतम साक्ष्यों, सार्वजनिक स्वास्थ्य की प्राथमिकताओं और WHO मॉडल सूची के अनिवार्य दवाओं को ध्यान में रखते हुए होनी चाहिए।

राष्ट्रीय अनिवार्य दवाओं की सूची का 역할 देश में स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता एवं सुलभता बढ़ाने में महत्वपूर्ण माना जाता है। यह सूची सरकार को यह निर्देशित करती है कि कौन-कौन सी दवाएं आवश्यक हैं और जिन्हें सुनिश्चित रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसलिए इस सूची का अद्यतन समय-समय पर आवश्यक हो जाता है, ताकि नई चिकित्सकीय प्रगति और बदलते रोग पैटर्न को ध्यान में रखा जा सके।

नागरिक समाज संगठनों का तर्क है कि वर्तमान में जो प्रक्रिया लागू है, उसमें पारदर्शिता की कमी है और हितों के टकराव से सम्बंधित चिंताएं भी पाई जाती हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी दवा सूची तभी प्रभावी होगी जब वह वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित हो तथा स्थानीय तथा वैश्विक स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुरूप हो। उन्होंने WHO की मॉडल सूची के अनुकरण को भी आवश्यक बताया, क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूची में अत्याधुनिक चिकित्सा विज्ञान का समावेश होता है।

संगठनों ने सरकार से अपील की है कि NLEM के संशोधन के काम में विशेषज्ञों, चिकित्सकों, फार्मासिस्टों और मरीजों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए। साथ ही, प्रक्रिया धीमी होकर वर्षों तक न चले बल्कि एक निश्चित समय सीमा में इसे पूरा किया जाए। इससे देश के आम नागरिकों को अधिक सस्ते और प्रभावी इलाज की सुविधा मिल सकेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि सही प्रकार से संशोधित राष्ट्रीय अनिवार्य दवाओं की सूची से न केवल इलाज में सुधार होगा, बल्कि चिकित्सा खर्चों को भी नियंत्रित किया जा सकेगा। यह कदम भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को बढ़ाने तथा स्वास्थ्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक अहम मोड़ साबित होगा।

सरकार ने अब तक इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय यह बात मानता है कि नियमित पुनरावृति आवश्यक है। आने वाले समय में नागरिक समाज संगठनों तथा सरकार के बीच चर्चा या संवाद की संभावनाएं बनी हुई हैं।

संक्षेप में, राष्ट्रीय अनिवार्य दवाओं की सूची को अपडेट करने की यह मांग भारत के स्वास्थ्य तंत्र को और अधिक सक्षम और उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास है। इससे न केवल मरीजों को बेहतर इलाज मिलेगा, बल्कि दवाओं की गुणवत्ता और उपलब्धता में भी सुधार होगा।

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