तमिल सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता विजय ने अपनी शुरुआत एक ऐसे समय में की थी, जब उनकी कला की परख सीमित दर्शकों तक ही सीमित थी। उनका पहला कदम एकल नायक के रूप में फिल्म “नालैय थेर्पू” से हुआ, जिसे उनके पिता और प्रसिद्ध निर्देशकों में से एक एस.ए. चंद्रशेखर ने निर्देशित किया था। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाई, लेकिन इसने युवा विजय को दर्शकों और क्रिटिक्स के बीच पहचान दिलाई।
1992 में रिलीज हुई “नालैय थेर्पू” का दर्शकों पर सामान्य प्रभाव था, क्योंकि फिल्म की कहानी और प्रस्तुति ने उतनी गहराई नहीं छुई जितनी अपेक्षित थी। इसके बावजूद, विजय का अभिनय शैली ने कुछ खास लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत करते हुए “सर्वश्रेष्ठ नए चेहरे” का पुरस्कार सिनेमा एक्सप्रेस से प्राप्त किया, जो उनके अभिनय की क्षमताओं को मान्यता देने वाला पहला बड़ा कदम था।
उस समय विजय महज 18 वर्ष के थे, और वह चेन्नई के लॉयोला कॉलेज के छात्र थे। कॉलेज के गलियारों में चलते हुए एक सामान्य युवा से लेकर बड़े पर्दे के सितारे बनने की उनकी यात्रा आसान नहीं रही। उस दौर में उनके प्रयास और समर्पण ने ही उन्हें तमिल फिल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने में मदद दी।
राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर केन्द्रित फिल्मों के लिए जाने जाने वाले विजय की आगे की फिल्में इस शुरुआती असफलता के बावजूद दर्शकों को प्रभावित करने लगीं। उनके पिता के निर्देशन में बनी कुछ फिल्मों ने उनकी प्रतिभा को निखारा और अंततः उन्हें सिनेमा जगत के एक प्रमुख अभिनेता के रूप में स्थापित किया।
इस प्रकार, “नालैय थेर्पू” भले ही व्यावसायिक तौर पर सफल न रही हो, लेकिन यह विजय के करियर की नींव साबित हुई। यह फिल्म उनके संघर्ष और संभावनाओं की शुरुआत थी, जिसने उन्हें आगे जाकर ‘जाना नायक’ बनने का रास्ता दिखाया। आज विजय का नाम केवल तमिल सिनेमा में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में करोड़ों दिलों में प्यार और सम्मान के साथ लिया जाता है।

