‘‘Two Women’’ फिल्म के निर्देशक क्लोए रोबीशॉड ने एक ऐसे विषय को चुना है जिसे कॉमेडी में परोसा जाना था, लेकिन यह प्रयास औसत दर्जे का ही साबित होता है। यह फिल्म कहीं न कहीं पुराने समय की एक पेटी सोच में अटकी हुई नजर आती है, जिस वजह से इसका मनोरंजन मूल्य सीमित हो जाता है।
फिल्म की कहानी में दो महिलाओं के बीच के सम्बन्धों को हास्यप्रद रूप में दिखाने का प्रयास किया गया है, लेकिन कथानक और पात्रों की संरचना पारंपरिक और पुराने क्लिशेज़ की झलक देती है। विरोधाभास यह है कि तारीफ़ किये जाने वाले विषय को प्रस्तुत करते समय यह फिल्म उस जटिल और आधुनिकता से दूर चली जाती है, जो आज की कॉमेडी से अपेक्षित होती है।
स्क्रीनप्ले में जो हास्य का आधार डाला गया है, वह कई बार पुरानी सोच से प्रेरित होकर नए जमाने के दर्शकों से तालमेल नहीं बैठा पाता। कई दृश्य ऐसे हैं जहाँ पात्रों के बीच संवाद और परिस्थिति अधिकतर पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं, जो आज के सामाजिक परिवेश के अनुरूप नहीं लगते।
फिल्म के तकनीकी पहलुओं को देखें तो निर्देशन और छायांकन में कोई खास नवीनता देखने को नहीं मिलती। संवाद कहीं-कहीं हल्का-फुल्का अच्छा तो हैं, पर वे कहानी के साथ मेल खाने में असमर्थ रहते हैं। स्थापित कॉमिक टाइमिंग का भी अभाव दर्शकों को निराश कर सकता है।
संक्षेप में कहा जाए तो, ‘‘Two Women’’ फिल्म एक संभावित मनोरंजक कॉमेडी हो सकती थी, लेकिन वह पुरानी सोच से खुद को मुक्त नहीं कर पाई। नए दर्शकों की उम्मीदों और आधुनिक कॉमेडी की मांग के बीच यह बीच में कहीं फंस गई है। ऐसे में यह फिल्म ज्यादा से ज्यादा उन लोगों के लिए उपयुक्त है जो पारंपरिक हास्य शैलियों की ओर झुकाव रखते हों।

