गोवा के आदिवासी भोजन परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं, लेकिन फोटोग्राफर अस्सावरी कुलकर्णी ने इन्हें नई किताब में संजोने का अनूठा प्रयास किया है। अपने कैमरे और लेखनी के माध्यम से, उन्होंने उन पारंपरिक व्यंजनों को जीवंत किया है जिन्हें स्थानीय वनवासियों ने सदियों से अपनाया है।
अस्सावरी की यह पुस्तक गोवा की आदिवासी संस्कृति और उनके खान-पान पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में उभर कर आई है। इसमें मशरूम से लेकर लकड़ी की राख से बनाए जाने वाले पारंपरिक पेनकेक्स तक के व्यंजनों का विस्तार से वर्णन है। ये व्यंजन न केवल स्वादिष्ट हैं बल्कि प्रकृति के साथ घनिष्ठ जुड़ाव का प्रतीक भी हैं।
कुलकर्णी के अनुसार, इस पुस्तक का मकसद केवल व्यंजनों को संरक्षित करना नहीं बल्कि गोवा के वनवासियों के जीवन के तरीके और उनकी पारिस्थितिकी के प्रति सम्मान को बढ़ावा देना है। उन्होंने बताया कि कई आदिवासी पकवान घरों में अब धीरे-धीरे भूलाए जा रहे हैं, और युवा पीढ़ी में ये ज्ञान कम होता जा रहा है।
एक उदाहरण के रूप में, उस मशरूम को लिया जा सकता है जिसे अधेरे जंगलों में हाथ के नीचे पकाया जाता है। स्थानीय लोग इसे ‘‘झाड़ी के स्वाद’’ के नाम से जानते हैं और इसे भोजन के साथ विशेष सम्मान देते हैं। इसके अलावा, लकड़ी की राख से बनने वाले पेनकेक्स पारंपरिक वस्त्र और त्योहारों के समय बनाए जाते हैं।
पुस्तक में तस्वीरों के जरिए भी इन व्यंजनों की प्रक्रिया को दर्शाया गया है, जो पढ़ने वालों को इन खास पकवानों की जोत में ले जाती हैं। अस्सावरी ने कई बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ समय बिताया जो इन व्यंजनों को बनाना जानते हैं, और उनकी कहानियों को भी शामिल किया है।
गोवा की सरकार और सांस्कृतिक संस्थान भी इस तरह के प्रयासों का स्वागत कर रहे हैं क्योंकि इससे स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होता है। क्या यह पुस्तक आदिवासी खान-पान को पुनर्जीवित कर सकेगी, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन निश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण कदम है।
अस्सावरी कुलकर्णी की यह पुस्तक न केवल गोवा के लिए, बल्कि पूरे देश में पारंपरिक खाद्य परंपराओं के संरक्षण का संदेश देती है। उनके शब्दों में, ‘‘ये व्यंजन सिर्फ खान-पान की चीजें नहीं, बल्कि हमारी जड़ों का हिस्सा हैं जिन्हें हमें बचाना होगा।’’

