नई दिल्ली: पूर्व महाराष्ट्र मंत्री और शिक्षा विशेषज्ञ फौजिया खान ने हाल ही में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा जारी किए गए तीन-भाषा नियम को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। यह याचिका 15 मई को जारी सीबीएसई के सर्कुलर को आधार मानकर दाखिल की गई है, जिसे याचिकाकर्ता ने ‘मनमाना और अनुचित’ बताया है।
फौजिया खान ने अपने आवेदन में कहा है कि इस नए नियम के तहत कक्षा 9 के छात्रों के लिए अनिवार्य रूप से तीन भाषाएँ पढ़ाने की नीति न केवल छात्रों पर अतिरिक्त बोझ डालती है बल्कि शिक्षा के मौलिक सिद्धांतों के भी विरुद्ध है। उनका तर्क है कि यह नियम स्कूली छात्रों की भाषा सीखने की क्षमता, स्थानीय भाषायी विविधता, और उनके मनोवैज्ञानिक और शैक्षिक विकास को हानि पहुंचा सकता है।
सीबीएसई ने 15 मई को एक नवीनतम सर्कुलर जारी किया था जिसमें कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन करना अनिवार्य कर दिया गया है। इस सर्कुलर के तहत सभी राज्य और मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थान इससे संबंधित दिशा-निर्देशों का पालन करेंगे। हालांकि, इस नियम को लेकर कई शिक्षाविदों और अभिभावकों के बीच विरोध की आवाजें उभरने लगी हैं। वे इसे छात्रों के अकादमिक दबाव में वृद्धि और स्थानीय भाषाओं के दमन के रूप में देखते हैं।
फौजिया खान ने बताया कि शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को स्वतंत्र सोच और स्वत्रंत विकास के अवसर प्रदान करना है, न कि उन्हें पाबंदी और अनावश्यक प्रणाली में फंसाना। उन्होंने न्यायालय से आग्रह किया है कि CBSE के इस आदेश को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाए और एक व्यापक परामर्श के बाद ही कोई भी नई भाषा नीति लागू की जाए।
इस याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायालय से उम्मीद है कि वह शिक्षा मंत्रालय और CBSE से इस विषय में विस्तृत रिपोर्ट मांगेगा ताकि नीतिगत निर्णय छात्रों की बेहतरी को ध्यान में रखकर लिए जा सकें। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस विवाद में मुख्य मुद्दा भाषा शिक्षा की गुणवत्तात्मक व्यवस्था और क्षेत्रीय भाषाओं की समग्र सुरक्षा है।
दूसरी तरफ, CBSE के अधिकारियों ने कहा है कि तीन-भाषा नीति छात्रों के लिए बेहतर बहुभाषी क्षमता विकसित करने और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का एक प्रयास है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि इस नियम का सख्ती से पालन न करने वाले स्कूलों पर उचित कार्रवाई की जाएगी।
इस मामले की आगे की सुनवाई और न्यायालय का निर्णय सभी शिक्षा प्रेमियों और अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण होगा। यह निर्णय न केवल कक्षा 9 के छात्रों की भाषा शिक्षा की दिशा तय करेगा बल्कि पूरे देश में शैक्षिक नीतियों पर भी गहरा प्रभाव डालेगा।
