नई दिल्ली। दाता अंडाणु का उपयोग करने वाली महिलाओं में भी गर्भधारण की एक छिपी सीमा होती है, जो मुख्य रूप से गर्भाशय की आंतरिक परत (एंडोमेट्रियम) में आयु संबंधित बदलावों के कारण होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक ऐसी चुनौती है जो अब तक व्यापक रूप से समझी नहीं गई है, लेकिन भविष्य में इसका इलाज संभव हो सकता है।
प्रजनन विशेषज्ञों ने कहा है कि जैसे-जैसे महिला की उम्र बढ़ती है, गर्भाशय के भीतर की सतह में बदलाव आते हैं, जो भ्रूण के अटैचमेंट और सफल गर्भधारण के लिए आवश्यक वातावरण को प्रभावित करते हैं। यह बदलाव अंडाणु की गुणवत्ता से अलग एक स्वतंत्र कारण है जो गर्भधारण की क्षमता को सीमित करता है।
डॉ. रेखा शर्मा, एक वरिष्ठ प्रजनन विशेषज्ञ ने बताया कि उम्र के साथ एंडोमेट्रियम में सूजन, रक्त संचार में कमी और कोशिकीय स्तर पर असामान्यताएं देखने को मिलती हैं। ये सभी कारक भ्रूण के विकास के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करने में बाधा डालते हैं।
उन्होंने आगे कहा, “अधिकांश महिलाओं को यह जानकारी नहीं होती कि दाता अंडाणु के उपयोग के बावजूद उनके गर्भाशय की स्थिति भी गर्भधारण की सफलता में अहम भूमिका निभाती है। इसलिए सिर्फ अंडाणु की गुणवत्ता पर ध्यान देने के बजाय, गर्भाशय की स्थिति का मूल्यांकन भी जरूरी है।”
अनुसंधान इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है कि कैसे गर्भाशय में आ रहे इन उम्र संबंधी परिवर्तनों को रोका या सुधारा जा सकता है। संभावित उपचारों में हार्मोनल थेरेपी, एंटी-इंफ्लेमेटोरी दवाएं, और स्टेम सेल आधारित उपचार शामिल हो सकते हैं। यदि ये उपचार सफल रहे, तो इससे बढ़ती उम्र की महिलाओं के लिए नए अवसर पैदा होंगे, जो गर्भधारण में समस्या झेल रही हैं।
प्रजनन विशेषज्ञों की इस नई समझ से निश्चित रूप से न सिर्फ उपचार के विकल्प बढ़ेंगे, बल्कि महिला प्रजनन स्वास्थ्य पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ेगा। यह खोज विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो बढ़ती उम्र में भी मातृत्व का सपना संजोए हुए हैं।
इस विषय पर और अधिक जानकारी और विशेषज्ञ सलाह के लिए प्रजनन केंद्रों से संपर्क करना फायदेमंद रहेगा। ताजा शोधों की मदद से महिलाओं का प्रजनन स्वास्थ्य बेहतर बनाने के लिए व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं।

