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‘An assault on collective memory’: Sukhbir Badal slams removal of Satluj from OTT platform
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‘An assault on collective memory’: Sukhbir Badal slams removal of Satluj from OTT platform

पंजाब की दर्दनाक इतिहास और शहीदों के सर्वोच्च बलिदान को उजागर करने वाली शक्तिशाली फिल्म ‘सतलुज’ को OTT प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के मामले में प्रतिक्रियाओं का सिलसिला जारी है। श्री सुखबीर सिंह बादल ने इस फैसले की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि इस तरह की हरकतों से न केवल पंजाब की सामूहिक स्मृति पर हमला होता है, बल्कि न्याय के प्रति अपमान भी होता है।

सुखबीर बादल ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, “एक ऐसी शक्तिशाली फिल्म जो बहादुरी से पंजाब के दर्दनाक इतिहास को सामने लाती है और श्री जसवंत सिंह खालड़ा की सर्वोच्च बलिदान को सम्मानित करती है, उसे इस तरह चुप कराया नहीं जा सकता।” उन्होंने कहा कि यह फैसला दर्शाता है कि कुछ लोग सच को दबाने और इतिहास को तोड़मोड़ कर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने मीडिया कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाएं और जनता को इस महत्वपूर्ण फिल्म और पंजाब के इतिहास के बारे में जागरूक करें। सुखबीर बादल का यह भी कहना था कि सतलुज जैसी फिल्मों को समर्थन देने की आवश्यकता है ताकि आने वाली पीढ़ियों को उनके इतिहास, त्याग और संघर्ष की सही जानकारी मिल सके।

बताया जा रहा है कि OTT प्लेटफॉर्म ने विवादों के मद्देनजर सतलुज फिल्म को अपनी सूची से हटा दिया, जिससे फिल्म के निर्माणकर्ताओं और समर्थकों में भारी रोष व्याप्त है। इस फिल्म में उस समय के मानवाधिकार हनन और अन्यायों को बखूबी उकेरा गया है, जो पंजाब के लोगों के लिए बेहद संवेदनशील विषय है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी एक आघात है, जो लोकतंत्र के लिए हानिकारक है। मीडिया विशेषज्ञ अजय मलिक कहते हैं, “सच्चाई को दबाने की यह कोशिश नहीं चलेगी। ऐसी फिल्मों की मौजूदगी ही समाज को जागरूक और सशक्त बनाती है।”

इस पूरे मामले ने फिर से चर्चाओं को जन्म दिया है कि कैसे डिजिटल माध्यम पर कंटेंट को सेंसर या हटाने के फैसले लिए जा रहे हैं, और इससे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर क्या प्रभाव पड़ता है। पंजाब और देश के इतिहास को लेकर इस तरह के विवाद आगे भी जारी रहने की संभावना है।

वहीं, सतलुज फिल्म के निर्देशक और कलाकारों ने भी इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि यह न केवल फिल्म से जुड़ी प्रतिभाओं की मेहनत पर पानी फेरने जैसा है, बल्कि इसे देखने वाले दर्शकों के साथ भी अन्याय है।

सारांश रूप में कहा जा सकता है कि सतलुज फिल्म के OTT प्लेटफॉर्म से हटाए जाने का विवाद पंजाब की सामूहिक यादों, इतिहास और न्याय के प्रति एक चुनौती के रूप में उभरा है। इस मामले में आगे क्या कदम उठाए जाएंगे, यह वक्त ही बताएगा। फिलहाल, इस मुद्दे ने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी है, जिसमें हर पक्ष के तर्क और भावनाएं शामिल हैं।

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