नई दिल्ली: भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि संशोधित अधिकारिता अधिनियम (RPwD Act) में एसिड सेवन से आंतरिक चोटिल हुए व्यक्तियों को भी शामिल किया जाएगा। यह संशोधन पीड़ितों को अधिक व्यापक सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया जा रहा है। खास बात यह है कि यह संशोधन लागू होने की तिथि से पीछे भी प्रभावी होगा, यानी मई 22, 2026 से पूर्व हुए आंतरिक चोटिल मामलों में भी इसका लाभ मिलेगा।
श्रम, रोजगार और सामाजिक न्याय मंत्रालय ने अदालत को जानकारी देते हुए बताया कि संशोधन के कारण अब वे लोग जिनके शरीर के अंदर एसिड से चोट लगी है, वे भी 2016 के अधिनियम के तहत अपनी स्थिति दर्ज कर सकते हैं और सरकारी सुविधाएं प्राप्त कर पाएंगे। इससे पहले अधिनियम सीमित रूप से शरीर पर बाहरी चोटिल व्यक्तियों तक ही लागू था।
सरकार का यह कदम उन्हें न्याय दिलाने के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है, क्योंकि आंतरिक चोटिल व्यक्ति अक्सर अपनी पीड़ा और असमर्थता के कारण अनदेखे रह जाते थे। अधिनियम के तहत अब यह सुनिश्चित किया जाएगा कि पीड़ितों को शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और पुनर्वास की व्यापक सहूलियतें मिलें।
केंद्र सरकार की ओर से यह भी बताया गया कि संशोधन के तहत उत्पन्न नए वर्गों के लिए विशेष योजना बनाई जाएगी, जिसमें उनके लिए चिकित्सा सहायता तथा आर्थिक मदद के प्रावधान होंगे। न्यायालय में तथ्यों की प्रस्तुति के दौरान अधिवक्ता ने कहा कि यह कदम पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संशोधन से न केवल न्यायपालिका की संवेदनशीलता बढ़ेगी, बल्कि समाज में पीड़ितों के प्रति सहानुभूति और जिम्मेदारी की भावना भी प्रबल होगी। वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में यह बदलाव एक प्रगतिशील और समावेशी दृष्टिकोण का परिचायक है।
कुल मिलाकर, सरकार का यह प्रयास दिव्यांगता एवं विकलांगता से जुड़ी पिछड़ी सोच को दूर कर उनकी सुरक्षा को नया आयाम देने का संकेत है। सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद यह संशोधन देश के उन लाखों लोगों के लिए राहत लेकर आएगा, जो अब तक अनदेखे और असहाय महसूस करते रहे हैं।

