लोहीत नदी के बेसिन में एक नए बांध के बनने से स्थानीय जल प्रवाह और पानी की धुंधलाहट में बदलाव आ सकता है, जो सफेद पेट वाले सारस (White-bellied Heron) की स्थानीय विलुप्ति का कारण बन सकता है। यह पक्षी वैज्ञानिक रूप से पहली बार 1878 में टेस्टा क्षेत्र से प्राप्त नमूनों के आधार पर वर्णित किया गया था, लेकिन आज वह वहाँ नहीं पाया जाता।
सफेद पेट वाला सारस अपने अत्यंत दुर्लभ अस्तित्व के लिए जाना जाता है और 2007 से इसे ‘गंभीर खतरे’ की श्रेणी में रखा गया है। इस पक्षी की संख्या इतनी कम है कि इसके स्थानिक निवास में आए किसी भी बदलाव से इसके जीवन पर गहरा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बांध के निर्माण से नदी की पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव आएगा, जिसमें जल प्रवाह की गति और पानी की गुणवत्ता दोनों प्रभावित होंगे।
पारिस्थितिकीविद कहते हैं कि बांध के चलते नदी की धुंधलापन बढ़ने या कम होने से मछलियों और छोटे जलीय जीवों की संख्या पर प्रभाव पड़ेगा, जिनपर सफेद पेट वाले सारस निर्भर करते हैं। इससे खाद्य श्रृंखला में व्यवधान आया है, जो इस पक्षी की बचे हुए आबादी के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
इस मामले में पर्यावरण संरक्षण समूह और पक्षी विशेषज्ञ सरकार से अपील कर रहे हैं कि बांध निर्माण से पहले व्यापक पर्यावरणीय मूल्यांकन किया जाए। वे चाहते हैं कि संरक्षण के लिए उपयुक्त उपाय किए जाएं ताकि सफेद पेट वाले सारस की प्रजाति का अस्तित्व सुरक्षित रह सके।
लोहीत नदी के मैदानी क्षेत्रों में कई वर्षों से पर्यावरणविद जीव-जन्तुओं की नदियों और जंगलों में घटती संख्या को लेकर चिंतित हैं। सफेद पेट वाला सारस एक संकेतक प्रजाति के रूप में जाना जाता है, जिसका अस्तित्व पर्यावरण की सेहत को दर्शाता है। यदि यह पक्षी विलुप्त हो जाता है, तो यह क्षेत्र के जैविक संतुलन में बड़े बदलाव का संकेत होगा।
सरकार और स्थानीय प्रशासन को चाहिए कि वे बांध परियोजना के संभावित नकारात्मक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए संरक्षण रणनीतियाँ विकसित करें। साथ ही पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में समुदाय के सहयोग से संरक्षण संबंधी कदम बढ़ाएं ताकि प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
सफेद पेट वाले सारस के लिए यह एक निर्णायक समय है। यदि प्रकृति और विकास के बीच संतुलन न पाया गया तो यह दुर्लभ पक्षी इतिहास की पुस्तकों में केवल एक नाम बन कर रह जाएगा। इसलिए, समुचित संरक्षण नीतियों के साथ पारिस्थितिकी की रक्षा करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

