हैदराबाद, 27 अप्रैल: एक समय था जब फिल्म पोस्टर और दुकानों के साइनेबोर्ड्स को हाथ से रंगना एक खास हुनर माना जाता था। ये कलाकार अपनी कला के जरिये न केवल जीविका कमाते थे, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी बन गए थे। लेकिन आज डिजिटल प्रिंटिंग तकनीक के बढ़ते चलन के कारण यह शिल्प एक विलुप्त होती कला बनती जा रही है।
हैदराबाद के पारंपरिक साइनेबोर्ड पेंटिंग कलाकार, जो बीते दशकों से ब्रश और रंगों के जरिये अपनी कला प्रस्तुत करते आए हैं, अब एक संकुचित बाजार में भी अपनी जगह बनाए रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं। डिजिटल प्रिंटिंग ने जहां काम की गति और लागत में कमी लाई है, वहीं इसने हाथ से बनी कला की मांग को सीमित कर दिया है।
56 वर्षीय राघव पांडे, जो पिछले 30 सालों से साइनेबोर्ड पेंटिंग कर रहे हैं, बताते हैं, “पहले लोग हाथ की बनी पेंटिंग को अधिक महत्व देते थे। उनकी दुकानों या फिल्मों के लिए कस्टम डिजाइन तैयार करना हमारी कला का हिस्सा था। आजकल ज्यादातर लोग जल्दी और सस्ते में डिजिटल साइने बनवा लेते हैं।”
फिल्म उद्योग भी अब डिजिटल पोस्टर और बड़े-बड़े प्रचार सामग्री में निवेश कर रहा है। इसी कारण राघव जैसे कलाकारों को पारंपरिक काम मिलना कम होता जा रहा है। हालांकि कुछ रेस्टोरेंट्स, पुराने व्यवसाय और सांस्कृतिक कार्यक्रम अभी भी हस्तशिल्प के प्रति कृतज्ञता दिखाते हैं और उनके लिए यह शिल्प जीवित रखने का प्रयास करते हैं।
महिला कलाकार मंजू आलम भी इस ट्रेड में लंबे समय से सक्रिय हैं। उनका कहना है, “हमारी कला और मेहनत उस तेजी से नहीं मापी जाती जो डिजिटल प्रिंटिंग की मशीनें देती हैं। लेकिन फिर भी, जो ग्राहक हमारे काम की मांग करते हैं, उनके लिए हम हमेशा तैयार रहते हैं। यह हमारे लिए कला से जुड़ा एक जुनून है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में भी हस्तशिल्प को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाओं और कार्यक्रमों की आवश्यकता है, ताकि ऐसे कलाकार अपनी परंपरा और कलात्मकता को नई पीढ़ी तक पहुंचा सकें।
हैदराबाद के साइनेबोर्ड पेंटर्स की कहानी सिर्फ कला के संरक्षण की नहीं, बल्कि उन बदलावों का भी प्रतीक है जो तेजी से तकनीकी प्रगति से प्रभावित होते समाज में चल रहे हैं। इन कलाकारों की मेहनत और काबिलियत को याद रखना और संजोना हमारी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने का मार्ग होगा।

