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From ruin to revival: How digital technology is reshaping the restoration of heritage structures

संरक्षण आर्किटेक्ट्स ने डिजिटल तकनीक के माध्यम से विरासत संरचनाओं के पुनर्स्थापन में क्रांति लाई

नई दिल्ली। विरासत संरचनाओं का संरक्षण आज एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया है, लेकिन डिजिटल तकनीकों के उपयोग से इन ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने के प्रयासों में नयापन आया है। संरक्षण आर्किटेक्ट्स श्री आर. मणियारासन और श्री साक्थि मुरुगन ने अपने कई पुनर्स्थापन परियोजनाओं के अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे फोटोग्रामेट्री और लिडार (LiDAR) तकनीक इतिहास को संजोने में सहायक साबित हो रही हैं।

फोटोग्रामेट्री के माध्यम से संरचनाओं की तस्वीरों से उच्च गुणवत्ता वाले 3D मॉडल तैयार किए जाते हैं, जो कि पुनर्स्थापन प्रक्रिया को सटीक और प्रभावी बनाते हैं। दूसरी ओर, LiDAR, जो लेजर लाइट का उपयोग करके स्थानों की मापन करता है, संरचनाओं की सूक्ष्म जानकारी देता है, जिससे नष्ट या क्षतिग्रस्त भागों की पहचान में मदद मिलती है।

आर. मणियारासन ने बताया, “परंपरागत तरीकों से मुआयना करने में समय अधिक लग जाता था और त्रुटियां भी होती थीं। लेकिन आज इन तकनीकों से हम संरचनाओं का डिजिटल रूप में सटीक रिकॉर्ड रख सकते हैं और किसी भी क्षति की स्थिति में तत्काल सुधार कर सकते हैं।”

साक्थि मुरुगन ने कहा, “इन तकनीकों से न केवल संरक्षण कार्य तेज होता है, बल्कि इनसे जुड़ी जानकारी सरकार और विशेषज्ञों के बीच अधिक पारदर्शिता के साथ साझा की जा सकती है, जिससे सर्वांगीण विकास संभव होता है।”

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल टूल्स के इस्तेमाल से भारत के विरासत स्थलों के पुनरुद्धार में नई ऊर्जा मिली है। ये तकनीकें न केवल इतिहास के संरक्षण में मदद करती हैं, बल्कि पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।

सरकार एवं निजी संस्थान अब इन आधुनिक तकनीकों को अपनाने में तेजी ला रहे हैं ताकि संस्कृतिक धरोहरों को बचाया जा सके और नई पीढ़ी तक उनकी वास्तविक छवि पहुंचाई जा सके। संरक्षण वास्तुकारों के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल युग में विरासत संरक्षण एक नई दिशा प्राप्त कर रहा है।

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